सीकर जिले में अरावली की तलहटी में बसा रैवासा केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी धार्मिक और स्थापत्य विरासत के लिए भी जाना जाता है।
यहाँ स्थित दिगंबर जैन भव्योदय अतिशय क्षेत्र अपनी भव्य वास्तुकला, बारीक नक्काशी और धार्मिक महत्व के कारण लंबे समय से श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है।
मेरे पास वर्ष 2017-18 के आसपास की इस मंदिर की कुछ तस्वीरें हैं। उस समय मंदिर का स्वरूप मुख्य रूप से सफेद और गुलाबी रंग की सुंदर वास्तुकला में दिखाई देता था।
विशाल खंभे, मेहराबें, जालीदार नक्काशी, शिखर और अंदर का शांत वातावरण मंदिर की खूबसूरती को अलग पहचान देते थे। लेकिन अब इस मंदिर ने एक और नया रूप ले लिया है।
अब स्वर्णिम आभा में दमक रहा है मंदिर
हाल ही में सामने आई जानकारी के अनुसार मंदिर के सौंदर्यीकरण का काम करीब ढाई वर्ष तक चला। इस दौरान मंदिर के खंभों और दीवारों की बारीक नक्काशी को और अधिक उभारने के लिए गोल्डन वर्क किया गया है।
बताया गया है कि इस काम में रोजाना करीब 12 से 13 कारीगर जुटे रहे। समाज के 108 लोगों ने एक-एक पिलर के काम की जिम्मेदारी भी उठाई।
नक्काशी पर सुनहरी परत चढ़ने के बाद मंदिर के अंदर रोशनी पड़ती है, तो इसकी दीवारें और खंभे सुनहरी चमक से दमक उठते हैं।
बताया जाता है कि इसके लिए शुद्ध सोने को विशेष केमिकल के साथ मिलाकर तैयार किए गए लिक्विड का इस्तेमाल किया गया है। इसका उद्देश्य मंदिर की पुरानी नक्काशी को छिपाना नहीं, बल्कि उसकी खूबसूरती को और अधिक उभारना है।
108 खंभे और उनसे जुड़ी रोचक मान्यता
इस मंदिर की सबसे दिलचस्प बात इसके 108 खंभे बताए जाते हैं। मान्यता है कि जिनालय 108 खंभों पर बना हुआ है, लेकिन इन खंभों को गिनना अपने आप में एक पहेली जैसा है।
कहा जाता है कि लोगों ने कई बार इन खंभों की गिनती करने का प्रयास किया, लेकिन हर बार संख्या अलग सामने आने की बात कही जाती है।
यही कारण है कि यहाँ की खूबसूरत स्थापत्य कला के साथ-साथ 108 खंभों की गिनती भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई है।
मंदिर के अंदर दिखाई देती है अद्भुत स्थापत्य कला
मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही सफेद रंग के विशाल खंभों और सुंदर मेहराबों की कतार दिखाई देती है। दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी, जालीदार खिड़कियाँ और छत की सजावट इसकी स्थापत्य कला को खास बनाती है।
मंदिर के अलग-अलग हिस्सों में तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ और धार्मिक कलाकृतियाँ भी देखने को मिलती हैं। शांत वातावरण और सफेद संगमरमर की चमक इस पूरे परिसर को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति देती है।
भगवान आदिनाथ और अन्य तीर्थंकरों के दर्शन
यहाँ मूलनायक भगवान आदिनाथ की प्रतिमा विराजमान बताई जाती है। इसके साथ ही भूगर्भ से प्रकट हुई भगवान सुमतिनाथ की अतिशयकारी प्रतिमा भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।
पास स्थित नसियाँ जी में मूलनायक भगवान चंद्रप्रभु की पद्मासन प्रतिमा के साथ भगवान शांतिनाथ और सहस्रफणी पार्श्वनाथ की लगभग 7 फीट ऊँची पद्मासन प्रतिमाएँ भी बताई जाती हैं। यहाँ श्रद्धालुओं को चौबीसी के दर्शन भी होते हैं।
मंदिर का इतिहास
बताया जाता है कि इस मंदिर (जिनालय) का निर्माण वीर निर्वाण संवत् 1674 में हुआ था। वीर निर्वाण संवत् 1674 का ईस्वी सन् 1147 ई. (CE) और विक्रम संवत 1204 होता है।
वीर निर्वाण संवत, विक्रम संवत और ईस्वी सन
जैन धर्म में वीर निर्वाण संवत का विशेष महत्व है। यह कालगणना भगवान महावीर के निर्वाण की स्मृति से जुड़ी है। जैन परंपरा के अनुसार भगवान महावीर को कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन पावापुरी में निर्वाण प्राप्त हुआ था और इसी घटना को आधार बनाकर वीर निर्वाण संवत की परंपरा चली।
दीपावली का पर्व भी जैन समाज में इसी निर्वाण दिवस से जुड़ा हुआ है। इसके अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से जैन नववर्ष आरंभ होता है और वीर निर्वाण संवत का नया वर्ष शुरू माना जाता है।
वीर निर्वाण संवत की यह परंपरा आज भी जैन समाज में जीवित है और धार्मिक साहित्य, पंचांग तथा ऐतिहासिक लेखों में इसका प्रयोग मिलता है।
विक्रम संवत इससे अलग भारतीय कालगणना है, जिसका आरंभ परंपरागत रूप से लगभग 57 ईसा पूर्व से माना जाता है। दोनों संवतों में सामान्य रूप से लगभग 470 वर्षों का अंतर माना जाता है।
वहीं ईस्वी सन आज दुनिया में सबसे अधिक प्रचलित कालगणना है। उदाहरण के लिए, 2026 ईस्वी के साथ राष्ट्रीय पंचांग में महावीर निर्वाण संवत 2553 और विक्रम संवत 2083 का उल्लेख मिलता है।
इस तरह किसी जैन मंदिर, शिलालेख या पुराने धार्मिक विवरण में यदि वीर निर्वाण संवत की कोई तिथि दी गई हो, तो वह केवल एक वर्ष की संख्या नहीं, बल्कि भगवान महावीर के निर्वाण और जैन समाज की अपनी प्राचीन कालगणना से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहचान होती है।
यही कारण है कि जैन धर्म से जुड़े प्राचीन स्थलों और ऐतिहासिक विवरणों में वीर निर्वाण संवत का उल्लेख विशेष महत्व रखता है।
पुरानी तस्वीरों में एक रूप, आज एक नया रूप
मेरे द्वारा ली गई वर्ष 2017-18 के आसपास की तस्वीरों को अगर आज के स्वर्णिम रूप से जोड़कर देखा जाए, तो मंदिर की खूबसूरती में आया बदलाव साफ महसूस किया जा सकता है।
उस समय इसकी सफेद वास्तुकला, गुलाबी दीवारें और बारीक नक्काशी अपने आप में बेहद आकर्षक थीं, जबकि अब गोल्डन वर्क ने इन्हीं नक्काशीदार हिस्सों को एक नई चमक दे दी है।
रैवासा का यह दिगंबर जैन भव्योदय अतिशय क्षेत्र इसलिए खास है क्योंकि यहाँ धर्म, आस्था, इतिहास और स्थापत्य कला एक साथ दिखाई देते हैं।
रैवासा का यह जिनालय आज भी अपनी पुरानी स्थापत्य पहचान को सँजोए हुए है, लेकिन स्वर्णिम नक्काशी ने इसकी उसी विरासत में एक नया रंग जोड़ दिया है।
करीब 2017-18 के स्वरूप से लेकर आज के स्वर्णिम रूप तक की यह यात्रा बताती है कि किसी पुरानी धरोहर की सुंदरता समय के साथ किस तरह और निखर सकती है।











