राजस्थान के सीकर जिले में स्थित रैवासा धाम भगवान श्रीराम और माता सीता की भक्ति से जुड़ा एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यहाँ स्थित श्री जानकीनाथ मंदिर रैवासा पीठ की प्रमुख पहचान है।
रैवासा पीठ के बारे में बताया जाता है कि श्री जानकीनाथ मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 1517 में हुई थी। इसे रैवासा के प्राचीन मंदिरों में प्रमुख माना जाता है।
रैवासा पीठ का संबंध रामानंद परंपरा और रसिक उपासना से बताया जाता है। पीठ के संस्थापक संत अग्रदास (अग्रदेवाचार्य) जी महाराज को इस परंपरा का प्रमुख आचार्य माना जाता है।
कहा जाता है कि अग्रदास जी, कृष्णदास पयहारी की शिष्य परंपरा से जुड़े थे। रैवासा में उन्होंने भगवान श्रीराम और माता सीता की रसिक भाव से उपासना की परंपरा को आगे बढ़ाया।
रैवासा से जुड़ी धार्मिक मान्यता के अनुसार, अग्रदास जी महाराज को यहाँ माता सीता के साक्षात दर्शन हुए थे। इसी आस्था के कारण मंदिर का नाम जानकीनाथ पड़ा, जो भगवान श्रीराम का एक नाम है।
अग्रदास जी महाराज के बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने विवाह और होली से जुड़े पदों की रचना की थी। इन पदों को जनकपुर तक गाए जाने की बात भी कही जाती है।
तुलसीदास जी से भी जुड़ा है रैवासा
रैवासा धाम का संबंध गोस्वामी तुलसीदास जी से भी बताया जाता है। कहा जाता है कि तुलसीदास जी रैवासा पीठ में आए थे और यहाँ उन्होंने कई पदों की रचना की।
इनमें “जानकी नाथ सहाय करें, तब कौन बिगार करें नर तेरो” जैसे प्रसिद्ध पद का नाम लिया जाता है। तुलसीदास जी के रैवासा आने और यहाँ पदों की रचना करने की बात धार्मिक परंपरा में कही जाती है।
रैवासा की संत परंपरा का संबंध नाभादास जी से भी बताया जाता है। नाभादास जी को भक्तमाल का रचयिता माना जाता है। कहा जाता है कि वे अग्रदास जी के शिष्य थे और रैवासा की संत परंपरा से उनका संबंध रहा।
जानकीनाथ मंदिर की खासियत
जानकीनाथ मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी की प्रतिमाएँ विराजमान हैं। मंदिर में होने वाली अखंड रामधुनी भी इसकी खास पहचान है।
यहाँ दिन-रात रामनाम का संकीर्तन चलता है। साधु-संत और शिष्य अलग-अलग समय पर रामधुनी में अपनी सेवा देते हैं। यह परंपरा लंबे समय से लगातार चलती आ रही है।
रैवासा पीठ के बारे में यह भी कहा जाता है कि वैष्णव परंपरा की 37 आचार्य पीठों में से 12 पीठों की परंपरा इस गद्दी से जुड़ी है। यह रैवासा पीठ की धार्मिक परंपरा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात मानी जाती है।
राघवाचार्य महाराज का योगदान
रैवासा धाम के पूर्व पीठाधीश्वर स्वामी राघवाचार्य जी महाराज का भी इस पीठ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे वेदांत विषय में गोल्ड मेडलिस्ट थे और राजस्थान संस्कृत अकादमी के अध्यक्ष भी रह चुके थे।
उन्होंने वेद शिक्षा और आश्रमों के विकास के लिए भी काम किया। राजस्थान में वेद आश्रम की स्थापना और वेद शिक्षा को बढ़ावा देने में उनका योगदान बताया जाता है।
राघवाचार्य जी महाराज का 30 अगस्त 2024 को निधन हो गया। इसके बाद राजेंद्र दास महाराज को रैवासा पीठ का 18वाँ पीठाधीश्वर बनाया गया।
इस तरह रैवासा धाम केवल एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम और माता सीता की भक्ति, रसिक उपासना, संत परंपरा, धार्मिक साहित्य और वेद शिक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है। सीकर जिले का यह धाम राजस्थान की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत में विशेष स्थान रखता है।
